परिचय
लाईम एवं लेमन का उत्पादन व्यापारिक दृष्टिकोण से उष्णकटिबंधीय एवं उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में की जाती है जहाँ इस जाति में एसिड लाईम (साईट्रस ओरंटीफोलिया) मौसमी एवं मीठे नारंगी के बाद तीसरा मुख्य फसल है, वहीँ दूसरी तरफ नींबू (साईट्रस लिमोन) का उत्पादन सिमित क्षेत्रों में किया जाता है। भारत दुनिया के देशों में लाईम एवं लेमन उत्पाद में 5वां स्थान रखता है। भारत संभवतः दुनिया में एसिड लाईम का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। इसका उत्पादन प्रायः भारत के सभी प्रदेशों में होता है। तमिलनाडु, कर्नाटका, गुजरात, बिहार, हिमाचल प्रदेश में इसकी प्रचुर मात्रा में खेती होती है। भारत में लेमन, लाईम की अपेक्षा कम लोकप्रिय है, फिर भी इसकी खेती व्यापारिक दृष्टिकोण से पर्याप्त मात्रा में पंजाब, राजस्थान एवं उत्तरप्रदेश के तराई क्षेत्रों में की जाती है।
एसिड लाईम के अतिरिक्त स्वीट लाईम (साईट्रस लाईमटवाडीस) टाहिटी लाईम (साईट्रस लैटीफोलिया) एंव रंगपुर लाईम साइट्रस लिमोनिया) की सिमित खेती भी भारत में की जाती है। उत्तर भारत में स्वीट लाईम इस जाती का मुख्य फल है टाहिटी लाईम का कर्नाटका एंव तमिलनाडु प्रदेश में अच्छा उत्पादन होता है, फिर भी मीठा एवं टाहिटी लाईम व्यापारिक उत्पादन दृष्टिकोण से एसिड लाईम को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है। रंगपुर लाईम की खेती मुख्यतः प्रकन्द के लिए की जाती है।
जलवायु एवं मिट्टी
एसिड लाईम के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु की आवश्यकता होती है नींबू के सबसे कोमल फल होने के कारण इसकी खेती देश के सभी भागों में की जाती है, जो पाला से प्रभावित नहीं है इसकी खेती मुख्यतया सूखे क्षेत्रों में की जाती है इसकी खेती के लिए गर्भ, मध्यवर्त्ती आर्द्र, तेज हवा एवं पालारहित जलवायु आदर्श मानी जाती है। उत्तरी भारत में जहाँ का तापक्रम विशेष अवसरों पर शून्य से नीचे गिर जाता है एसिड लाईम के व्यापारिक उत्पादन के लिए घातक सिद्ध हो जाता है। दक्षिण एवं मध्य भारत के पालारहित क्षेत्रों में जहाँ की वर्षा 750 मि. मि. ज्यादा नहीं होती, इस फसल का अच्छा प्रदर्शन होता है। इसकी खेती औसत समुद्री सतह से 1000 मीटर की ऊंचाई पर भली प्रकार की जा सकती है बशर्ते कि आर्द्रता कम एवं अनुकूल हो। असम एवं बंगाल के अधिक आर्दता वाले क्षेत्रों में जहाँ वर्षा 1200 मिमि० से अधिक है, लाईम –साइट्रस कैंकर एवं पाउडरी मिल्ड्यू से ज्यादा प्रभावित हो जाता है। जिसके कारण इसके पेड़ अनुत्पादक एवं कम अवधि के हो जाते हैं।
एसिड लाईम के विपरीत मीठा लाईम का उत्पादन विपरीत जलवायु परिस्थिति में भी की जा सकती है। चूँकि या एसिड लाईम से ज्यादा कठोर प्रवृति वाला है। इसलिए यह पाला अवस्था को भी कुछ हद तक सह सकता है। यह उत्तरी भारत के शुष्क में अवस्था में दक्षिण भारत के समान जलवायु रहने पर भी ज्यादा उपज देता है।
रंगपुर लाईम की खेती पूरे भारत में विशेषकर शुष्क क्षेत्रों में की जाती है। रंगपुर लाईम के लिए अनुकूल तापक्रम 20-30 से०ग्रे० है आर्द क्षेत्रों में यह स्कैब रोग ग्रसित हो जाता है।
एसिड लाईम की अपेक्षा लेमन अपने जलवायु परिस्थिति में ज्यादा उदार देती है. लेमन लाइम की अपेक्षा अधिक गर्मी एवं ठण्ड सह सकते हैं। इनकी अनुकूलनशीलता अधिक होती है क्योंकि ये आर्द्र एवं कम आर्द्र क्षेत्रों, समतल एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी प्रकार फूल-फल सकते हैं।
लेमन औसत समुद्री सतह से 1200 मीटर की ऊंचाई पर भी अच्छा उत्पादन देते हैं एसिड लाईम की अपेक्षा ये पाला को अधिक सह सकते हैं, इसलिए पाला प्रभावित क्षेत्रों में लेमन द्वारा लाईम को प्रतिस्थापित किया जाता है।
एसिड लाईम की खेती अनेक प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है। इसकी खेती काली मिट्टी एवं हल्की दोमट मिट्टी में भली प्रकार की जा सकती है। लाईम के लिए 2.0 -2.5 मीटर गहरी मिट्टी, व्यवस्थित जल-निकास, जैविक पदार्थ सम्पन्न, एवं उर्वरता वाली दोमट मिट्टी अनुकूल पायी गयी है। यह जल-जमाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील होता है। इसके लिए अस्थिर भू-गर्भीय जलस्तर, निचला क्षेत्र, जलजमाव आदि हानिकारक हैं। उचित जल-निकास सहित भारी मिट्टी इसकी अच्छी पैदावार दे सकती है। पर खेत काफी थकानेवाली तथा नीरस हो जाती है। इससे अधिक विकास एवं उपज के लिए अच्छी जल निकास, 6.5 से 7.0 पी० एच० वाली मिट्टी अच्छी होती है। क्षारीय या अधिक चूनावाली मिट्टी इसके लिए उपयुक्त नहीं होती है क्योंकि इस परिस्थिति में सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता कम हो जाती है।
लाईम की खेती अनेक प्रकार की मिट्टियों की की जा सकती है एवं दो दोषपूर्ण मिट्टी को भी सह सकता है, फिर भी इसकी खेती जल निकास वाली गहरी दोमट मिट्टी में सफलतापूर्वक की जा सकती हैं।
लेमन की खेती भी उपरोक्त की भांति अनेक प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है। बलुआही दोमट या दोमट मिट्टी अच्छे जल निकास के साथ, इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। लेमन की खेती अधिक उत्पादन सहित छिछली गहराईवाली मिट्टी में भी हो सकती है जहाँ 1.0 मीटर गहराई तक जल एवं हवा की काफी मात्रा उपलब्ध स्थिति में हो।
प्रभेद
एसिड लाईम
यूँ तो लाईम की खेती सदियों से की जा रही है, फिर भी इसकी कोई उन्नत किस्म उपलब्ध नहीं है। साधारणतः खेती की जानेवाली लाईम एसिड लाईम है जिसे कागजी नींबू कहा जाता है। लाईम के विभिन्न प्रभेदों के पेड़ों में अधिक बदलाव नहीं होता है। महाराष्ट्रमें विक्रम दो प्रभेद एक पूर्वजक द्वारा पह्चानित किये गये हैं एवं उन्हें व्यापारिक तौर पर उत्पादन हेतु विमुक्त किया गया है, क्योंकि या कैंकर से मुक्त तथा प्रचुर मात्रा में फल देते हैं।
प्रभालिनी
इसके फल 3.7 के गुच्छे में होते हैं तथा साधारण कागजी नींबू से 30% अधिक उपज देते हैं। इनके फलों में 57% रस होता है जो कि विक्रम (53%) एवं साधारण नींबू (52%) से अधिक होता है।
विक्रम
इसके फल 3.7 के गुच्छे में होते हैं तथा बेमौसमी फल भी सितम्बर, मई एवं जून माह में प्राप्त हो जाते हैं। इसका उत्पादन साधारण लाइम से 30-32% ज्यादा होता है।
चक्रधर
यह बीज रहित होता होता है इसके पौधे सीधे, घने होते है। इसके फल गोल होते हैं। इसमें 60 -66% बीज रहित रस होता है, जबकि दूसरे प्रभेद में 52-62% रस होता है तथा प्रतिफल 6-8 बीज होते हैं। पौधा-रोपण के चार साल पश्चात फल आना प्रारंभ हो जाता है इसके फल जनवरी–फरवरी जून-जुलाई तथा सितम्बर-अक्तूबर में आते हैं।
पी० के० एम० 1
इसके फल गोल, मध्यम- बड़े आकार एवं आकर्षक पीले रंग का छिलका लिए होता है। इसमें 52.31% रस होता है। स्थानीय प्रभेदों से इसकी उपज अधिक होती है।
स्लेकशन 49 – यह प्रचुर मात्रा में फल देता है। इसके फहल बड़े आकार के होते है, इसके फल ग्रीष्मकाल में आते हैं। तथा कैंकर, ट्रिसटेजा एवं पत्ती छेदक रोग के प्रतिरोधी हैं।
सीडलेस लाईम
यह लाईम का नया सलेक्शन है। इसके फल का आकर अंडाकार, छिलका –पताला, गेंदाफूल का रंग प्रचुर फल होने के कारण देर से एंव स्थानीय प्रभेदों से दुगुना उपज देता है।
स्वीट-लाईम
स्वीट लाईम उपरोक्त लाईम से एकदम अलग का समूह है जिसका जन्म स्थान संदेहात्मक है। इसका स्वाद मीठा होता है, इसके फल गोलाकार, पीला, हल्का, छिलका, चिकना, पीलापन लिए उजला गूदा, रसदार एवं मीठा तथा बीज हल्के रंग के होते हैं। स्वीट लाईम का उत्पादन मुख्य रूप से प्रकन्द एवं अम्ल रहित फलों के लिए किया जाता है इसके दो प्रभेदों की खेती भारत्त में होती है।
मीठा चिकना
इसके फल गोलाकार, पीला रंग, चिकना चमकदार सतह, तेल ग्रंथि युक्त, छिलका पतला, कठोर, मध्य कड़ा गुदा, रसदार, एवं कम बीज वाले होते हैं।
मीठोट्रा
इसके फल बड़े, चोटी दबी हुई, लेमन पीला रंग, छिलका मोटा एवं कड़ा, तेल ग्रंथि युक्त, पीलापन-उजला गुदा, मीठा, अच्छे गंधवाले होते हैं। रस का गंध मीठा चिकना के अपेक्षा काफी सुहावना होता है।
रंगपुर लाईम
यह स्वदेशी फल है। इसके पेड़ हमेशा हरे, फैले हुए एवं काफी उत्पादन देनेवाले होते है। इसका चिल्का एवं गुदा नारंगी रंग का, छिलका पतला एवं गुदे से जल्द अलग हो जानेवाला होता है। इसकी खेती मुख्यतया प्रकन्द के लिए की जाती है। कुछ अंश तक इसकी खेती फूलदार पौधों के रूप में तथा फल के लिए की जाती है। इससे लाईमनेड बनाया जाता है। रंगपुर लाईम के अनेक उभेद है पर इसकी पह्चानित प्रभेद नहीं है।
लेमन
सही लेमन को दो अलग-अलग समूहों में बांटा गया है- एसिडलेमन एवं स्वीट लेमन। एसिड लेमन की खेती भारत में होती है वहीं स्वीट लेमन की खेती दक्षिण अमेरिका एवं मिश्र में होती है। फल एवं पेड़ की विशेषताओं के आधार पर सही लेमन के चार समूहों में विभाजित किया गया है- यूरेका, लिसबान, एनामालस एवं स्वीट लेमन।
युरेका
इसके फल का रंग लेमन पीला, झुरीदार सतह, खुरदरा, अंडाकार, मध्य आकार, गोल आधार, ग्रीवायुक्त, 9-10 हिस्सों में बंटा हुआ, अधिक रसदार, पूरा अम्लीय, गुणवत्ता एंव सुहावना एवं 6-10 बीज होए है, इसमें पूर्व में फल आ जाते है तथा पैदावार अधिक होती है। इसके फल डाली के अंत में दो पत्तियों के साथ आते हैं। पंजाब में इसके फल अगस्त पश्चात पकते हैं।
लिसबान
इसके फल लेमन पीला, चिकना, सतह, फल का आकार अंडाकार, मध्यम आकार, आधार पतले गर्दन की तरह ऊपर का भाग गोला, छिलका खुरखरा, 7-10 हिस्सों में बंटा हुआ, अधिक रसदार, पूरा अम्लीय एवं बीज की संख्या 0-10 होती है।
विलाफ्रांका
यह यूरेका लेमन जाति का होता है। इसके फल अंडाकार, मध्य-बढ़ा आकार, तेज लेमन पीला रंग, नुकीलीदार चोटी, आधार गोल, छिलका पतला एवं चिकना, 10-12 हिस्सों में बंटा हुआ, रंगहीन रस, अच्छा गंध एवं 25-30 बीज होते हैं।
लखनऊ सीडलेस
इसके फल अंडाकार, लेमन पीला, चिकना शीर्षनुकिला, पतला छिलका, खाली मध्य रेखा, 10-13 हिस्सों में बंटा हुआ, रसदार, गंध अच्छा एवं खट्टा, लगभग बीज रहित होते हैं तथ नवम्बर-जनवरी तक पकते हैं।
कागजी कलान
इसके फल का आकार मध्यम, गोल, पीला, आधार गोल, पतला चिलका, चिकना, गुदा अम्लीय, हल्का, पीला, रसदार एवं 8-13 बीज होते हैं।
नेपाली आबलौंग (आसाम लेमन)
इसके फल लेमन पीला, आधार गोल, ऊपरी हिस्सा नोंकदार, पतला छिलका, चिकना खाली मध्य रेखा, 10-13 हिस्सों में बंटा हुआ, गुदा, हल्का पीला, रसदार, अच्छा गंध, खट्टा तथा लगभग बीज रहित होते है। इसके फल दिसम्बर-जनवरी तक पकते हैं।
नेपाली राउंड
इसके फल गोल एवं रसदार होते हैं।
पन्त लेमन – यह कागजी कलान का सलेक्शन है। इसके फल मध्यम आकार (80-100), गोल एवं चिकना पतला छिलका, रसदार, कैंकर ट्रिसटेजा, डाईबैक प्रतिरोधी होते हैं। यह उत्तरप्रदेश के तराई क्षेत्र के लिए कागजी कलान का प्रतिस्थानी है क्योंकि कागजी कलान ट्रिसटेजा, कैंकर, एवं डाइबैक बीमारियों के लिए ग्रहणशील है।
प्रजनन
एसिड लाईम
एसिड लाईम का व्यापारिक उत्पादन हेतु प्रजनन बीज द्वारा होता है। इसे कटिंग, लेयरिंग एवं बडिंग द्वारा भी प्रजनित किया जा सकता है। इस विधि में वायरस बीमारी की संभावना कम हो जाती है, पर बीज द्वारा प्रजनन आसान एवं सस्ता होता है। साधारणतया बीज प्रजनन का प्रदर्शन बडिंग प्रजनन से अच्छा होता है क्योंकि इसमें पौधों के सूखने का दर कम होता है, प्रकृति के कुप्रभाव की क्षमता कम होती है तथा पौधे की आयु अधिक होती है।
प्रजनन हेतु चुनिन्दा पेड़ को चयनित किया जाता है जो बीमारी रहित हो तथा बड़े फल का उत्पादन करता हो। जून-जुलाई या नवम्बर-दिसम्बर में पूरे पक्के हुए फल को तोड़कर इकट्ठा किया जाता है। फल बड़े आकार, पूर्ण विकसित, प्रभेद के अनुसार अच्छे होता है। महत्तम अंकुरण प्राप्त करने के लिए दो दिन के ताजे निकाले गये बीज का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। आगे ताजा बीज की बुआई में देर होती है तो अंकुरण अच्छी प्रकार नहीं हो पाता है।
पौध तैयार करने हेतु पहले बीज की डैम्पिंग ऑफ़ बीमारी से बचने के लिए उचित फंगी साईड से उपचारित करना चाहिए। फिर इसे ऊपर उठे हुए बीज-बेड एन 15 सेंटीमीटरX 2.5 सेंटीमीटर अंतराल पर बुआई कर देनी चाहिए बीज-बेड के लिए बलुआही दोमट मिट्टी का चुनावकर उसे चूर-चूर कर पूरी मात्रा में कम्पोस्ट तथा फार्मयार्ड मैन्युर मिला देना चाहिए। फिर जून-जुलाई या नवम्बर-दिसम्बर में बीज की बुआई करनी चाहिए डैम्पिंग ऑफ़ बीमारी के नियंत्रण हेतु बीज को 1% बरडीजो मिश्रण से उपचारित कर देना श्रेयस्कर होता है बोये गये बीज में उचित अंतराल पर पानी देते रहना चाहिए। फिर पौध को पौधशाला में स्थानान्तरण कर देना चाहिए। पौध को पंक्ति से पंक्ति 46-50 सेंटीमीटर तथा पौधा से पौधा 20-30 सेंटीमीटर पर लगाना चाहिए। तत्पश्चात पौधशाला बेड में सिंचाई देते रहना चाहिए तथा जल्दी विकास के लिए नेत्रजनीय उर्वरक का प्रयोग कर खरपतवार बाहर निकाल देना चाहिए। एसिड लाईम पौध को 9-12 माह तक पौधशाला में रखना चाहिए फिर उसे पोलोथिन थैला या मिट्टी के गमले में स्थान्तरित कर वितिरित बिक्री कर देनी चाहिए।
पौधशाला के माली को पौध के धीरे विकास का भी सामना करना पड़ सकता है। कागजी लाईम को मुख्य जगह पर लगाने हेतु 12-14 महीने का समय लग जाता है। 1-1.5 यूरिया घोल का एक माह के अंतराल पर छिड़काव्
पौधा-विकास में गति प्रदान करता है। पौध विकास को त्वरित करने हेतु 40 पी० पी० एम० जीए से बीजोपचार करना लाभप्रद पाया गया है।
स्वीट लाईम
स्वीट लाईम का प्रजनन मुख्यतया लेयरिंग या कटिंग द्वारा होता है। या पौधा को कम समय में स्थापित कर देता है। शीर्ष की 3-4 पत्तियों सहित कटिंग करने पर इसमें 100% जड़ आने की संभावना रहती है, अगर इसे 50 एवं 100 पी० पी० एम० आईबीए के घोल में २४ घंटे या 200 पी० पी० एम० में 10 सेकेण्ड डुबाकर उपचारित किया जाए। इस प्रकार के प्रजनन से पौधे की जड़ ऊपरी सतह पर ही फैलती है क्योंकि वहीं से वे अपना भोजन प्राप्त करते हैं। वहीं रंगपुर लाईम का प्रजनन केवल बीज द्वारा किया जाता है।
लेमन- यों तो लेमन का प्रजनन बडिंग, लेयरिंग, मारकटिग, स्टेम कटिंग एवं बीज द्वारा किया जाता है, फिर भी बडिंग ज्यादा लोकप्रिय है क्योंकि इसके पौधे अवधि के पूर्व फल देना प्रारंभ कर देते हैं।
प्रकन्द
एसिड लाईम
गाजा नीमा (साइट्रस पेनीमेसीकुलता) एसिड लाईम का एक अच्छा प्रकन्द है, फिर रफ लेमन का नाम आता है। परिक्षण द्वारा पाया गया है कि रफ लेमन एफं स्वीट लाईम क्रमशः अच्छे प्रकन्द हैं इसी कारण रफ लेमन का आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र में एसिड लाईम के लिए प्रकन्द के रूप में उपयोगी किया जाता है।
बीज प्रजनन वर्तमान में भी आसान एवं कम कम खर्चीला होने के कारण ज्यादा प्रचलित है। फिर भी एसिड लाईम के लिए सुखा क्षेत्र के लवण युक्त, क्षारीय एवं कैलकेरियस मिट्टी में प्रकन्द का ही उपयोग किया जाता है। साधारणतया एसिड लाईम के प्रजनन के लिए पौध ही ज्यादा प्रचलित है।
लेमन- उत्तरप्रदेश के तराईवाले क्षेत्र में लेमन का प्रजनन ट्राईफोलियेट औरेंज एवं जाटी खट्टी द्वारा करने पर अच्छा प्रदर्शन होता है।
खेती
खेत की तैयारी
खेत की तैयारी वर्तमान परिस्थिति, विगत इतिहास एवं विकास की योजना पर निर्भर करता है। अगर भूमि पूर्व से खेती के अंतर्गत है एव्वं अच्छा प्रबन्धन है तो कोई खास प्रक्रिया करना जरुरी नहीं है। वहीं दूसरी तरफ अगर मिट्टी नई हो तथा पूर्व में खेती नहीं की जा रही है तो इस मिट्टी को अच्छी प्रकार जोत-कोड़कर बोआई के लिए तैयार करना होगा। इस मिट्टी पर आये हुए अनावश्यक वनस्पति, खरपतवार को अच्छी प्रकार साफ कर देना चाहिए, इसके बाद 2-3 बार गहरी जुताई करनी चाहिए तथा एक मौसम पूर्व मिट्टी को बराबर कर देना चाहिए।
अंतराल एवं रूपरेखा
लाईम की बुआई 4-6 मीटर दूरी पर करनी चाहिए। एसिड लाईम के लिए हल्की मिट्टी में 6 मीटर से कम का अंतराल अपर्याप्त है। मध्य भारत के मध्यम मिट्टी में लाईम की बुआई की दूरी 5.5-6.0 मीटर होनी चाहिए। छिछली मिट्टी के लिए यह दूरी 4.0-4.5 मीटर रखनी चाहिए। उत्तरी भारत के इंडो गंगा समतल क्षेत्र में बुआई की दूरी 5.0-6.5 मीटर रखनी चाहिए। प्रारंभ में पौधों की दूरी 8-10 वर्षों तक 3 मी०x3 मीटर रखनी चाहिए। फिर एकान्तर पंक्ति को काटकर हटा देना चाहिए जिससे पौधों को फैलने हेतु पर्याप्त जगह मिल सके। स्वीट लाईम की अच्छी उर्वरता वाली मिट्टी में यह दूरी 6 से 7.5 मीटर तथा कम उर्वरता वाली मिट्टी में यह दूरी 5.0-5.5 मीटर रखनी चाहिए। रंगपुर लाईम साधारणतया मेढ़ पर लगाये जाते हैं या रोड के दोनों तरफ तथा नर्सरी के कोने में 4-6 मी० की दूरी पर लगाना श्रेयष्कर होता है।
लेमन, लाईम की अपेक्षा ज्यादा फैलते हैं, इसलिए लेमन की दूरी लाईम से अधिक होनी चाहिए। लेमन के लिए अनुशंसित दूरी प्रभेद, मिट्टी एवं वर्षा के आधार पर 6.0 से 8.0 मीटर होनी चाहिए। लाईम एवं लेमन के लिए वर्गाकार पद्धति उपर्युक्त होती है।
गड्ढा बनाना एवं भरना
बुआई के 2-3 सप्ताह पूर्व ग्रीष्मकाल में 90-100 सेंटीमीटर के गढ़े तैयार किये जाते हैं। जलवायु मिट्टी एवं स्थान को ध्यान में रखते हुए गड्ढे को 15-30 दिन तक धूप मिलने के लिए छोड़ दिया जाता है, फिर गढ़े में सूखे पत्तियां या पुआल रखकर रोगाणुमुक्त करने हेतु जला दिया जाता है। बुआई 15 दिन पूर्व गढ़े की आधी निकाली गयी मिट्टी+तालाब का साद+लाल मिट्टी+ फार्म यार्ड मैन्युर+ हड्डी की खल्ली या सुपर फास्फेट एवं कीटनाशक से मिलाकर भर देना चाहिए, फिर मिट्टी को स्थिर करने हेतु पानी देना चाहिए।
बुआई
हल्के वर्षा वाले क्षेत्र में मानसून प्रारंभ (जून-अगस्त) होने पर बुआई करनी चाहिए जिससे पौध वर्षा का उपयोग कर सके। अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में (आसाम) बुआई वर्षा मौसम के अंत में करनी चाहिए। जिससे गढ़े में वर्षा जल जमाव की संभावना कम रहती है। सिंचाई वाले क्षेत्रों में बुआई फरवरी माह में करनी चाहिए। ग्रीष्मकालीन बुआई हेतु सुझाव नहीं दिया जाता है क्योंकि इस मौसम में नये पौध को जल्द सिंचाई देनी पड़ती है तथा गर्मी, हवा एवं अधिक तापक्रम से बचाना पड़ता है।
नये पौध का देखभाल
नये पौध को प्रारंभ के 3-4 वर्षों तक गर्मी आर्द्रता एवं ठण्ड से बचाना पड़ता है। जमीन के स्तर से 60-70 सेंटीमीटर तक पौध की डालियों को काटकर एक ही धड़ रखा जाता है हालांकि इस धड़ का सूर्य जलन से प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है, जिसके लिए इसे स्ट्रेन पेपर या कपड़े से ढँक देना चाहिए। उत्तरी समतली क्षेत्रों में पौध के कम तापमान तथा पाला से बचाने के लिए जल्द-जल्द हल्की सिंचाई देना तथा बगीचे को वायु अवरोध से घेर देना श्रेस्यकर होता है। नये पौधे 4 या 5 बार नई पत्तियां देकर अपना विकास करते हैं। इस विकास के क्रम में पत्ती छेदक, साइट्रस तितली एवं कैंकर का प्रकोप अधिक होता है, जिसका जल्द उपचार आवश्यक है। इसलिए फ्लशिंग के पूर्व नाइट्रोजनीय उर्वरक का हल्का प्रयोग करना चाहिए। नये लगाये पौध को जल्दी-जल्दी सिंचाई देना श्रेयस्कर होता है। लेकिन वर्षा के मौसम में जल जमाव, जो पौधा के लिए नुकसान है गड्ढे में नहीं रहना चाहिए। इसके लिए उपयुक्त जल-निकास की व्यवस्था करनी चाहिए।
ट्रेनिंग एवं काट-छांट करना
लाईम
छोटे एसिड लाईम पौधों को सेंट्रल लीडर पद्धति के रूप में ट्रेंड किया जाता है, जिसके लिए जमीन से 75-100 सेंटीमीटर तक सभी डालियों को काट दिया जाता है एवं 4.5 अच्छी डालियों को मचान के रूप में छोड़ दिया जाता है धड़ पर जमीन से 75 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर आनेवाले नए कोपलों को हटा देना चाहिए। इसी प्रकार बड़े पेड़ों के मुख्य धड़ में वाटर सकर्स निकलने पर उन्हें हटा देना चाहिए।
एक बार अगर छोटे पौधे को वांछित आकार के लिए ट्रेंड कर दिया जाता है तो इसमें आगे कम ही काट-छांट करना पड़ता है कम काट-छांट किये गये नये पौधों के धड़ में अधिक विकास होता है तथा पूर्व में फल आ जाते हैं। पौध में पानी सोखने वाले को निश्चित रूप से हटा देना चाहिए। फल कटने के तुरंत बाद पौध की छंटाई कर देने चाहिए एवं जल्द कटे हुए भाग को बरडीजो पेस्ट या ब्लाटॉक्स से उपचारित कर देना चाहिए।
लेमन
लेमन के पेड़ लाईम के पेड़ से अलग होते हैं- इन्हें थोड़ी अलग ट्रेनिंग एवं काट-छांट की जाती है। छोटे लेमन के पेड़ की प्रवृत्ति लंबे तथा फैलनेवाली डालियाँ विकसित करने की होती है तथा फल बगल की डालियों पर लगते हैं जिस कर्ण डालियाँ झुक जाती है।
पूर्ण विकसित लेमन के पेड़ में ज्यादा डालियों की काट-छांट करनी पड़ती है। लंबी डालियों जिसके चोटियों में फल आने वाले हैं उसकी कटाई कर देनी चाहिए जिससे जमीन की नजदीक की डालियों में ज्यादा फल आये। उन डालियों को जिस पर कुछ वर्षों से फल आ गये हैं उन्हें काट देना चाहिए तथा नए डालियों में उच्च गुणवत्ता वाले फल आने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए।
खाद एवं उर्वरक
खाद एवं उर्वरक प्रयोग की प्रक्रिया प्रभेद एवं मिट्टी पर निर्भर करती है। पौधा तत्व की आवश्यकता कार्बनिक एवं अकार्बनिक खाद एवं उर्वरकों से उपलब्ध करनी चाहिए। साईट्रस के लिए कार्बनिक खाद, का प्रयोग हेमशा लाभप्रद होता है क्योंकि इससे मिट्टी की अवस्था ठीक रहती है, तथा आवश्यक तत्वों की आपूर्ति होती है।
नाइट्रोजन का प्रयोग फार्म यार्ड मैन्युर (25%) तेल खल्ली (25 एवं रासायनिक उर्वरक (50%) के रूप में तथा फास्फेट एवं पोटाश का प्रयोग सुपर—फास्फेट एवं म्यूरेट ऑफ़ पोटाश इ रूप में क्रमशः करनी चाहिए। आंध्रप्रदेश में उर्वरक का प्रयोग साल में दो बार दिसम्बर-जनवरी (फूल देने के पूर्व) तथा जून-जुलाई (फल विकास की अवस्था)में की जाती है।
पूर्ण विकसित एसिड लाईम वृक्ष में 50 किलोग्राम फार्म यार्ड मैन्युर, 300 ग्राम नेत्रजन, 250 ग्राम पोटाश/प्रति वर्ष देना चाहिए। फार्म यार्ड मैन्युर (एफ० वाई० एम० ) एवं फास्फेट की पूरी मात्रा एंव नेत्रजन तथा पोटाश की आधी मात्रा वर्षा के वाद तथा शेष नेत्रजन एवं पोटाश की मात्रा फूल लगने के पश्चात मार्च-अप्रैल में देनी चाहिए। गुजरात में एसिड लाईम में चूना के प्रयोग की अनुशंसा की गयी है।
साधारणतया खाद एवं उर्वरक का प्रयोग मिट्टी ( बेसीन) में की जाती है चूँकि एसिड लाईम की जड़-प्रणाली गहरी नहीं होती है, जिससे जड़ 45-60 सेंटीमीटर की गहराई तक ही सिमित रहती हैं 15-25 सेंटीमीटर चौड़ा एवं 15-20 सेंटीमीटर गहरा गड्ढा पेड़ चारों तरफ 60-100 सेंटीमीटर धड़ से हटकर बनाया जाता है तथा इसी में उर्वरक कुदाल में मिला दिया जाता है।
सिंचाई –लाईम एवं लेमन की नारंगी के अपेक्षा अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में एसिड लाईम का 875 मि०मी०/ वर्ष जल आवश्यकता होती है।
पौधा विकास की अवधि में अधिक नमी की आवश्यकता होती है। ऐसी अवस्था में नमी की कमी होने पर पेड़ का विकास, फल का आकार छोटा, उत्पादन में कमी तथा फल टूटकर गिरने की गति में वृद्धि हो जाती है। इसलिए अत्यावश्यक है कि इस अवस्था में उचित्त सिंचाई की व्यवस्था की जाए।
भारत में साधारणतया सिंचाई हेतु बेसिन पद्धति ही अपनाई जाती है लेकिन ड्रिप सिंचाई अब्ब अधिक लोकप्रिय हो रहा है। ड्रिप सिंचाई के जड़ के पास की मिट्टी 60% भींगी कर देनी चाहिए। ड्रिप सिंचाई से 22-50% जल की बचत तथा अधिक उत्पादन एवं गुणवत्ता के फल उत्पादित होते हैं।
गर्मी मौसम में लाईम एवं लेमन को 5-7 दिन उपरान्त तथा ठंडा मौसम में 10-15 दिन अंतराल में सिंचाई देनी चाहिए। जब ऊपर की मिट्टी 25 सेंटीमीटर तक सुख जाती है तब सिंचाई दे देनी चाहिए। एसिड लाईम की अधिक पैदावार 50-60% उपलब्ध नमी की अवस्था में होती है। मिट्टी की नमी 55-65% फील्ड कैपिसिटी पर रखना अनुशंसित है, जबतक कि फल 2-5 सेंटीमीटर व्यास के न हो जाए। इसके पश्चात पत्तियों का मुरझाना ही सिंचाई देने की अवधि का संकेत है।
रख-रखाव
बगीचे के मिट्टी के व्यवस्थापन का अर्थ मिट्टी की जुताई, मल्चिंग एवं खरपतवार के नियंत्रण से है। बगीचा के गलियारे के मिट्टी की खरपतवार नियंत्रण हेतु जुताई, मिट्टी का नमी संरक्षण, उर्वरता संरक्षण हरी खाद मिट्टी तथा जड़ प्रणाली को हवादार बनाना चाहिए। इस मिट्टी की साल में दो बार जुताई प्रथम मानसून प्रारंभ होने के पूर्व तथा द्वितीय वर्षा समाप्त होने पर होनी चाहिए। बेसिन की मिट्टी को कड़ा होने से रोकने के लिए हल्की हाथ से कोड़ाई या होईंग प्रति 3-4 सिंचाई के पश्चात करनी चाहिए।
उष्णकटिबंधीय जलवायु में मल्चिंग का मुख्य स्थान है। साइट्रस के बगीचे में ग्रीष्म अवधि काफी खर्चीला है इसलिए एक वर्ष में 6 माह मल्चिंग करना आवश्यक है। पेड़ के बेसिन का मल्चिंग, खरपतवार, नमी संरक्षण, तापक्रम बदलाव का नियंत्रक मिट्टी में जैविक गतिविधियों में वृद्धि के लिए आवश्यक है। निकौनी करने के पश्चात बेसिन को सुखी पत्तियों, धान का भूसा, मूंगफली का छिलका, लकड़ी का बुराद, सीरियल फसल का पत्तवार, नारियल का रेशा एवं सूखे घास से मल्चिंग कर देना चाहिए। जनवरी से जून तक एसिड लाइम के बेसिन में 8 सेंटीमीटर मोटा या 120 किलोग्राम प्रति बेसिन 16 मीटर) मल्चिंग करना अनुशंसित है। 30 किलोग्राम/पेड़ हरी पत्ती का मल्चिंग काफी असरदार होता है।
खरपतवार नियंत्रण
साइट्रस बगीचे का खरपतवार नियंत्रण मोनौरॉन, ड्युरॉन एवं ग्रामोजोन के प्रयोग से किया जाता है। खरपतवार निकलने के पूर्व ड्युरॉन का 2-5 किलोग्राम/500 लीटर पाने में घोलकर मिट्टी में पेड़ से 30-40 सेंटीमीटर की दुरी पर छिड़काव् करना चाहिए। द्वि-दलीय खरपतवार के नियंत्रण हेतु अंकुरण के पूर्व ड्यूरॉन का छिड़काव् एवं ग्रामोजों+ड्यूरॉन का अंकुरण के पश्चात छिड़काव् करना प्रभावकारी होता है। ड्युरॉन (3 किलोग्राम)+ ग्रामोजों (1.5 किलोग्राम) का तीन महीने के के वार छिड़काव एसिड लाईम बगीचे का खरपतवार नियंत्रण करने में प्रभावकारी होता है। अंकुरण के पश्चात ग्लाईफास्फेट (2.0 किलोग्राम/हेक्टेयर का प्रयोग 15 दिनों के अंतराल पर करना श्रेयस्कर है।
अतंराल सस्य- बुआई के 5-6 साल बाद लाईम का बगीचा खाली अन्तर्भूमि के उपयोग हेतु अच्छा अवसर प्रदान करता है। दलहनी (बरसीन लुसर्न, काऊपी, मूंगफली, मुंग, उरद आदि) फसलों को लाईम एवं लेमन बगीचे एके अंतर्गत अंतर्भूमि में लगाया जा सकता है। सब्जी जैसे-कद्दू, टिंडा, प्याज, मुंग आदि ग्रीष्मकाल में तथा मटर, गाजर, शलजम, ठन्डे मौसम में लाईम बगीचे में लगाया जा सकता है।
अंतरफसल एंव कटाई पश्चात व्यवस्थापन
लाईम एवं लेमन की कटाई प्रभेद एवं स्थान पर अलग-अलग तरीके से होता है। उत्तरी-तटीय आंध्रप्रदेश में फसल की कटाई मार्च-अप्रैल, मध्य आंध्रप्रदेश में अप्रैल-मई एवं रायल सीमा में जुताई-सितम्बर माह में की जाती है। तमिलनाडु में लाईम एक कटाई का मौसम जून-अगस्त एंव जनवरी से मार्च है। मध्यभारत (महाराष्ट्र एंव गुजरात) कटाई का मुख्य मौसम जुलाई-सितम्बर है। उत्तरी भारत में एसिड लाईम की फसल बाजार में जून-जुलाई में आती है।
उत्तर भारत में स्वीट लाईम की फसल अगस्त-अक्टूबर, आसाम में सिंतबर से नवम्बर दक्षिण भारत में अगस्त से सितम्बर माह में बाजार में आती है। दक्षिण भारत में रंगपुर लाईम की कटाई जून-अगस्त माह में की जाती है।
लाईम एंव लेमन का रंग जब हरा से पीला होने लगता है- यदि समय कटाई का है। फिर भी हरा रंग के हालत में भी तैयार फल की तोड़ाई की जा सकती है जिससे इसके अम्लीय गुण का भी उपयोग किया जा सके।
फल को खींचकर तोड़ना नहीं बली कली पर से काटना चाहिए। अधिकतर फल की तोड़ाई लम्बे बांस में बंधे हुए लोहे के हुक एवं जाली द्वारा की जाती है।
एक अच्छा लाईम पौधा द्वारा वर्ष में 2000-5000 फल प्राप्त होते हैं, जबकि यह संख्या औसतन 3000 -3500 फल प्रति वर्ष है। एक लेमन पेड़ द्वारा औसतन 600-800 फल/ पेड़ प्राप्त होता है। इसकी संख्या अनुकूल परिस्थिति में 1000-1200 फल/पेड़ हो सकती है।
काटे गये फल को पैकिंग करनेवाले जगह पर जल्द लाना चाहिए। इन्हें सूर्य की रौशनी में ज्यादा देर तक नहीं रखनी चाहिए। वर्तमान में भारत में कोई ग्रेडिंग पद्धति नहीं अपनाई जा रही है। भारत में साइट्रस फलों का ग्रेडिंग मनुष्यों द्वारा मात्रा आकार के आधार पर किया जाता है।
साइट्रस फलों का हरा रंग कैल्सियम कार्बाइड द्वारा पकने वाले चैम्बर में हटाया जाता है। कैल्सियम कार्बाइड द्वारा एथलीन गैस का निर्माण होता है जो फल के रंग को समाप्त का देता है। तथा बिना गुणवत्ता के बदले पीला रंग प्रदान करता है एक साधारण तकनीक विकसित किया गया है जिससे टाहीटी लाईम का रंग हरा रहित हो जाता है। इस तकनीक में पूरा विकसित लाईम पक्के हो रहे केले के साथ वायुबंद चैम्बर में 6:1 (लाइम+केला) के अनुपात में रखा जाता है। केला पकने के क्रम में केले में एथिलीन गैस निकलती है जो लाईम का २४ घंटे के अन्दर हरा रंग हटा देता है।
बैस्क्सिंग एक तरीका है जिससे फल का मुरझाना तथा झुरी बनना रुक जाता है, जिससे इसकी अपनी जीवंतता बढ़ जाती है फल को 12% की वैक्सोल घोल में डुबाने से इसकी भंडारीकरण अवधि बढ़ जाती है। वैक्स द्वारा फल के छिलके के छिद्र बंद हो जाते हैं जिससे रेसपिरेशन एवं ट्रांसपिरेशन नहीं हो पाता है। फल को पॉलीथीन थैले में रखने से भी भंडारीकरण की अवधि बढ़ जाती है।
विकास नियत्रंक 2,4- ड़ी एवं 2,4,5 टी० प्रयोग से फल का जीवन कला बढ़ जाता है। फल का जीवन काल 2,4,-ड़ी के घोल में डुबोने से 25 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। जीए2 (200 एवं 500 पी० पी० एम्०) और साइटोशिनीन (10-25 पी० पी० एम्०) फल का बिनावजन घटाए तथा गुणवत्ता घटाए सेल्फ लाइफ बढ़ा देता है। जबकि एसिड लाईम कोल्ड स्टोरेज में 6-8 सप्ताह तक 8.3 सेंटीग्रेड -10 सेंटीग्रेड तापक्रम एवं 85-90% आर्द्रता पर संग्रहित किया जा सकता है, वहीं लेमन 8-12 सप्ताह तक 7.2सेंटीग्रेड -8.6 सेंटीग्रेड तापमान तथा 85-90% आर्द्रता पर संग्रहित किया जा सकता है।
क्रियात्मक विकृतियाँ
चटकना एवं फटना लाईम एवं लेमन की साधारनतया विकृतियाँ हैं। फलों का फटना मौसम बदलाव, सुखा पश्चात सिंचाई या अधिक वर्षा या बैक्टीरिया के आक्रमण से होता है। कभी-कभी गर्म हवा भी फलों के चटकने का कारण हो सकती है। सुखा के बाद सिंचाई हल्की होनी चाहिए। इसका रोकथाम ग्रीष्मकाल में जल्द-जल्द सिंचाई देने से हो सकती है।
समेकित फसल क्षतिकारक प्रबन्धन रणनीतियां
कृषीय प्रक्रिया
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गर्मी के मौसम में गहरी जुताई ताकि मिट्टी के अंदर रहने वाले पतिंगे रोगजनक एवं गोलकृमि बाहर निकल आए।
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गहरी अच्छी तरह समतल की हुई एवं अच्छी नालियों वाली भूमि का चयन करें।
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केवल प्रमाणित बीज का उपयोग ही होना चाहिए। बीज के लिए गर्म- जल उपचार (51-52 सेंटीग्रेड) 10 मिनट के लिए किया जा सकता है।
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प्रतिरोधी जड़-संग्रह उपयोग में लाएं एवं पौधशाळा से रोगमुक्त पौधे चुनें।
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मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर बनाने एवं कुछ मिट्टी जनित रोग के प्रबन्धन ले लिए जैविक पदार्थों के साथ ट्राईकोडरमा स्पीसीज का प्रयोग करें।
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जलजमाव एवं नालियों द्वारा सिंचाई से बचें।
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मिट्टी से होने वाले रोगजनकों से बचने के लिए कली को जितना संभव हो सके मिट्टी से दूर रखें।
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खेत में काम करते समय तना एवं जड़ों को चोट पहुँचाने से बचें।
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पाउडरी मिल्ड्यू के संक्रमण से बचने के लिए जल के निकट निकले कोंपलों को नियमित रूप से छांटें।
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नींबू वंशीय कुकरी(स्कैब) को कम करने के लिए ऊपर से जल के छिड़काव से बचें।
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एक दूसरे पौधे एक बीच उचित दूरी रखें तथा उचित सिंचाई एवं पोषक तत्व प्रबन्धन को अपनाएं। अधिक् नाईट्रोजन वाले उर्वरक लगाने से बचें। मात्र गोलकृमि वाले खेत में सुनिश्चित नमी की स्थिति में, प्रति हेक्टेयर एक टन की दर से नीम की खल्ली का प्रयोग करें।
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नींबू वंशीय सफेद/काली मक्खी एवं पाउडर जैसे दिखनेवाले कीट से बचाव के लिए एक-दूसरे पर चढ़ आई डालों को छांट देना ।
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गिरे हुए फलों की जमीन में गाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए। बगीचे को साफ-सुथुरा रखना चाहिए ताकि फल-चुश्क पतिंगों का विकास न हो सकें।
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आच्छादन फसल को मौसम के शुरूआती समय में ही निकल लें, इससे फल-चुश्क कीटों पर प्रभावकारी नियंत्रण होता है क्योंकि कीट-कोष अधिक दूर तक नहीं चल सकते हैं।
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बगीचे में पाये जानेवाले चीटियों के घरों का नष्ट कर देना चाहिए क्योंकि ये मिलीबग कीट के वाहक होते हैं।
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जैविक-एजेंट जिव जन्तुओं को जैसे मादा मादा चिड़िया भृंग, क्रिसोपेरला इत्यादि को बसाने के लिए निम्नलिखित फसल चक्र की अनुशंसा की जाती है।
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नींबू जातीय+लोबिया
2. नींबू जातीय+सोयाबीन
यांत्रिक प्रक्रिया
1. गिरे हुए पत्तों को हाथों से चुनकर हटाना सुनिश्चित करें।
2. नींबू वंशीय काली मक्खी, फल-मक्खी एवं नींबू तितली को नियंत्रित करने के लिए हल्के फंदे लगाये जा सकते हैं।
3. कज्जली फुफंद से ग्रसित बगीचों में स्ट्रार्च का 2% घोल छिडकने की अनुशंसा की जाती है। इसमें पत्तों की सतह से कज्जली फुफंद अलग हो जाती है जो सुख जाने पर गर्म हवा को झोकों से उड़ा दिया जाता है।
जैविक नियंत्रण प्रक्रिया
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मिट्टी जनित रोगों का प्रबन्धन जैविक पदार्थ के साथ ट्राईकोडरमा स्पीसीज 1:40 के अनुपात में 2 किलो कल्चर मिलाया हुआ/पौधे की दर से लगाएं। इससे मिट्टी जनित रोग विशेषकर फायटोथोरा, फ्युसैरियम एवं पीथियम प्रजाति के रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है।
संरक्षण
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परभक्षियों का संरक्षण करें जैसे –एम्बीलिसियस मोंट्रऔजेरी मल्लाडा, बोनीसिन्स , मेनोसिलस- सेक्समेक्युलेट्स, मकड़े एवं परजीवी जैसे अपानटेलेस, एफिट्स प्रोसिलया, लेप्टोमैरिसटक्स डैक्टीलोपी।
संवर्द्धन
नींबू वंशीय काली/सफेद मक्खी एवं मांहू की घटनाओं का अनुश्रवण करें एवं क्रिसोपेरला अथवा मल्लाडा के 10-15 अंडे अथवा लार्वा प्रति पेड़ की दर से छोड़ दें। जैविक नियंत्रण एजेंटों को छोड़ने के कम से कम एक सप्ताह बाद तक कीटनाशक के छिड़काव से बचें।
रसायनिक नियंत्रण प्रक्रिया
आईपीएम की परिधि के अंतर्गत कीटनाशकों का आवश्यकतानुसार विवेकपूर्ण एवं सुरक्षित व्यवहार रासायनिक नियंत्रण कार्रर्वाई के सबसे महत्वपूर्ण त्रिविधि खंड हैं इसमें फसल स्वास्थ्य का उचित अनुश्रवण ईटीएल का अवलोकन एवं प्राकृतिक जैविक नियंत्रण संभावानाओं के संरक्षण द्वारा वातावरण के साथ सुरक्षित व्यवहार करने के लिए आईपीएम् कुशलताओं का विकास करना शामिल है जिससे रासायनिक कीटनाशक का उपयोग करने से पूर्व इसे अंतिम उपाय समझा जा सके। अतः परिशिष्ट 111 में दी सूची के आधार पर कीटनाशकों पर भरोसा करना जरुरी है।
आईपीएम् रणनीति के सन्दर्भ में नियंत्रण उपायों की सफलता के लिए निम्नलिखित सुझावों का महत्वपूर्ण स्थान हैं।
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जहाँ तक संभव हो छिड़कावों ककी संख्या कम करें।
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दो या इससे अधिक कीटनाशकों का मिश्रण करने से बचें।
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एक ही कीटनाशक के बार-बार व्यवहार से बचना चाहिए।
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सिंथेटिक पायरेथ्रॉयदस के व्यवहार से बचें जिसका परिणाम चुश्क कीटों का पुनरुत्थान होता है।
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मौसम प्रारंभिक चरण के दौरान चुनिन्दा कीटनाशकों (इंडोसल्फान) का यवहार करें।
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व्यक्तिगत रूप से नीम आधारित सूत्रों का उपयोग करें।
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पायरेथ्रॉयडस का इस्तेमाल नियंत्रित रूप में होना चाहिए।
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उचित छिड़काव यंत्रों का व्यवहार होना चाहिए-
क. नींबू वंशीय बगीचे के लिए नैपसैक स्प्रेयर आदर्श है।
ख. अनजाने अकुशल छिड़काव यंत्र एवं सीडीए स्प्रेयर के व्यवहार को हतोत्साहित करें।
ग. इकाई क्षेत्र के लिए उचित मात्रा में छिड़काव करें।
फाईटोप्थोरा स्पीसीज द्वारा जनित रोगों का समेकित प्रबन्धन
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स्थापित स्थानीय क्षेत्र में अतिसंवेदनशील पौधों के खेती को तुरंत हतोत्साहित करें।
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पौधे लगाने के लिए प्रतिरोधी प्रकंदों का चयन करें।
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नाईट्रोजनी उर्वरक के अत्याधिक प्रयोग से बचना चाहिए।
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फाईटोप्थोरा मुक्त प्रमाणित नर्सरी से ऊँचे मुकुलन वाले (9 से अधिक उंचाई) पौधे का चयन करें।
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अंकुरण स्थल को अधिक से अधिक ऊँचा रखें ताकि सिंचाई का पानी कली तक न पहुंचे। सिंचाई की दोहरी गोलाई वाली पद्धति तने को पानी के संपर्क से दूर रखने में सहायता करती है।
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मिट्टी को सूखने दें एवं अत्याधिक पानी से सिंचाई न करें तथा सतह पर अधिक समय तक पानी का जमाव न होने दें।
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कृषि-कार्य करते समय तनों एवं जड़ प्राणाली को चोट लगने से बचाएं।
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1:40 के औसत के प्रति पौधा 2 किलोग्राम की दर से ट्राईकोडरमा को जैविक पदार्थ के साथ मिलाकर इस्तेमाल करें। मिट्टी में 60-70% नमी सुनिश्चित करें।
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आधार व जड़ की सड़न तथा ग्युयोसिस के प्रबन्धन के लिए समय पर कॉपर फफुदंनाशक, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% डब्ल्यू पी का इस्तेमाल प्रति हेक्टेयर 2.5 किलोग्राम की दर से करें।
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वर्षा काल प्रारंभ होने से पहले ही पेड़ के तनों पर बोरडॉक्स लेप रोग-निरोधक के रूप में लगाएं। एक तेजधार छुरी से आधार सड़न अथवा गमोसिस ग्रसित अंशों को खुरच कर निकाल दें लेकिन ध्यान रखें कि बोरडॉक्स लेप लगाने से पूर्व लकड़ी को क्षति न पहुंचे।
खरपतवार प्रबन्धन प्रक्रिया
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खेत की तैयारी, उर्वरक एंव सिंचाई प्रबन्धन के लिए अनुशंसित कृषि अभ्यासों का अनुसरण करें।
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समय से अंतरखेती एवं हाथों द्वारा उखाड़कर बगीचे को खरपतवार मुक्त रखना चाहिए।
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अल्काथिन फ़िल्म, गेहूं की भूसी, चावल की भूसी, पुआल इत्यादि से दक्कन भी खरपतवार को नियंत्रण में रखता है।
सूत्रकृमि (नेमाटोड) प्रबन्धन प्रक्रिया
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मिट्टी में रहनेवाले सूत्रकृमियों को बाहर निकालने के लिए गर्मी के मौसम में हल चलाएँ
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प्रतिरोधी मुकुलन/कलम द्वारा उत्पादन
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40 ग्राम प्रति पौधा की दर से नीम की खल्ली एवं पाइसीलोमायसेस लिटासिनस अथवा स्यूडोमोनास प्लूरसेंस (10 सिएफयु )का प्रयोग करे।
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कार्बोफ्यूरान का प्रयोग 1.00 किलोग्राम ए०आई/हेक्टेयर की दर से करें।
नींबू का अवस्थावर/कीटवार समेकित कीट प्रबन्धन
क्रम.सं. |
फसल चरण/ कीट |
आईपीएम् के घटक |
समेकित कीट प्रबन्धन |
1 |
बुनने के समयमिट्टी एवं बीज जनित बीमारियाँ |
कृषीय प्रक्रिया |
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रसायनिक प्रकिया |
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चुश्क कीट |
रसायनिक प्रकिया |
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2 |
पौधा –रोपण से पूर्व |
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3 |
वानस्पतिक विकास कृषीय प्रक्रियाचरण(1-5 वर्ष) खरपतवार |
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रसायनिक नियंत्रण |
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4 |
फल आने का चरण |
कृषीय प्रक्रिया |
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नींबू जातीय काली/सफेद मक्खियाँ |
कृषीय प्रक्रिया |
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यांत्रिक प्रकिया |
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जैविक प्रकिया |
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रसायनिक नियंत्रण |
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5 |
नींबू जातीय सिल्ला |
कृषीय प्रकिया |
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जैविक नियंत्रण |
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रसायनिक नियंत्रण |
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कीट |
रसायनिक नियंत्रण |
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फल चुश्क पतिंगे |
कृषीय प्रक्रिया |
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यांत्रिक प्रकिया |
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रसायनिक नियंत्रण |
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फल मक्खी |
कृषीय प्रक्रिया |
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यांत्रिक प्रकिया |
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जैविक प्रक्रिया |
2. प्राकृतिक शत्रुओं का संरक्षण एवं संवर्द्धन। |
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रसायनिक प्रक्रिया |
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नींबू तितली |
यांत्रिक प्रक्रिया |
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जैविक प्रक्रिया |
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रसायनिक प्रक्रिया |
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छालभक्षक कीड़ा कीट |
कृषीय प्रक्रिया |
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रसायनिक प्रक्रिया |
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मिलीबग |
कृषीय प्रक्रिया |
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यांत्रिक प्रक्रिया |
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जैविक प्रक्रिया |
|
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छोड़ें |
रसायनिक प्रक्रिया |
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नींबू जातीय पतिंगे |
कृषीय |
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जैविक प्रक्रिया |
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रसायनिक प्रकिया |
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रोग |
कृषीय प्रक्रिया |
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|
रसायनिक प्रक्रिया |
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