अनानास एक महत्वपूर्ण नकदी फसल है, जिसकी मांग पूरे वर्ष बनी रहती है। इसका उपयोग ताजे फल, जूस, जैम, कैंडी और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में किया जाता है। सही तकनीक अपनाकर किसान कम क्षेत्र में भी अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं।
जलवायु और मिट्टी का चयन
अनानास गर्म और आर्द्र जलवायु का पौधा है। इसके लिए 22°C से 32°C तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। अच्छी वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती बहुत अच्छी होती है। पानी का जमाव अनानास के लिए हानिकारक है, इसलिए खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। बलुई दोमट या दोमट मिट्टी, जिसका pH 4.5 से 6.5 हो, सबसे उपयुक्त रहती है।
खेत की तैयारी
खेत की 2–3 बार जुताई करके मिट्टी भुरभुरी बना लें। खरपतवार पूरी तरह साफ कर दें। पानी निकासी के लिए ऊँची क्यारियाँ या मेड़ बनाना लाभदायक रहता है। खेत में पर्याप्त मात्रा में सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएँ।
पौध सामग्री का चयन
अनानास की खेती में बीज का उपयोग नहीं किया जाता। इसकी खेती पौधे के मुकुट (Crown), सकर (Sucker) और स्लिप (Slip) द्वारा की जाती है। स्वस्थ, रोगमुक्त और 300–500 ग्राम वजन वाले पौधे चुनें। सकर और स्लिप से तैयार पौधे जल्दी फल देते हैं।
रोपण
रोपण का सबसे अच्छा समय वर्षा ऋतु की शुरुआत (जून–अगस्त) है। पौधों को कतारों में लगाया जाता है। सामान्यतः पौधे से पौधे की दूरी 30–45 सेंटीमीटर तथा कतार से कतार की दूरी 60–90 सेंटीमीटर रखी जाती है। रोपण के बाद हल्की सिंचाई करें।
सिंचाई प्रबंधन
अनानास को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन मिट्टी में नमी बनी रहनी चाहिए। वर्षा न होने पर 10–15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। ड्रिप सिंचाई अपनाने से पानी की बचत होती है और उत्पादन बेहतर मिलता है।
खाद एवं उर्वरक
रोपण के समय प्रति हेक्टेयर 15–20 टन गोबर की सड़ी खाद डालें। पौधों की वृद्धि के दौरान नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की संतुलित मात्रा दें। खाद को 2–3 भागों में बाँटकर देने से अच्छे परिणाम मिलते हैं। जैविक खेती में वर्मी कम्पोस्ट और नीम खली का उपयोग किया जा सकता है।
खरपतवार नियंत्रण
अनानास की फसल में खरपतवार बड़ी समस्या हो सकते हैं। नियमित निराई-गुड़ाई करें। पौधों के चारों ओर सूखी घास या पत्तियों की मल्चिंग करने से खरपतवार कम उगते हैं और नमी बनी रहती है।
रोग और कीट प्रबंधन
अनानास में जड़ सड़न, फल सड़न और मिलीबग जैसे कीटों का प्रकोप हो सकता है। खेत में जलभराव न होने दें और केवल स्वस्थ पौधे लगाएँ। रोग या कीट दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह लें।
फूल और फल बनना
रोपण के लगभग 12–18 महीने बाद पौधों में फूल आना शुरू होता है। फूल आने के 5–6 महीने बाद फल तैयार हो जाते हैं। फल पकने पर उनका रंग हरे से पीला होने लगता है और उनमें सुगंध आने लगती है।
तुड़ाई और विपणन
जब फल का लगभग एक-तिहाई भाग पीला हो जाए, तब उसकी तुड़ाई करें। फल को सावधानी से काटें ताकि चोट न लगे। ताजे फल, जूस उद्योग और स्थानीय बाजार में अच्छी कीमत प्राप्त की जा सकती है।
उत्पादन और कमाई
1 हेक्टेयर में लगभग 35,000–45,000 पौधे लगाए जा सकते हैं।
अच्छी देखभाल से 40–60 टन या उससे अधिक उत्पादन प्राप्त हो सकता है।
बाजार भाव, गुणवत्ता और क्षेत्र के अनुसार लाभ में अंतर हो सकता है।
प्रसंस्करण उद्योग से जुड़कर अतिरिक्त आय भी प्राप्त की जा सकती है।