बैंगन की खेती

बैंगन की वैज्ञानिक खेती

परिचय

बैंगन सालो भर पैदा होने वाली सब्जी है। इसमें पोषक तत्व के साथ-साथ औषधीय, गुण भी मौजूद है। खासकर उजला बैंगन डायबिटीज के रोगियों के लिए काफी फायदेमंद होता है। अगर किसान भाई इसकी खेती में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ तो अच्छी पैदावार लेकर पैसा कमा सकते है।

जलवायु

बैंगन को लम्बे गर्म मौसम कि आवश्यकता होती है। अत्यधिक सर्दियों में इस फसल को नुकसान पहुंचाते हैं।

भूमि

उपजाऊ एवं पूर्ण जल-निकास वाली भूमि अच्छी पैदावार के लिए अति आवश्यक है। यह एक ठोस पौधा है और सभी तरह के मिट्टी पर पैदा किया जा सकता है परन्तु दोमट और हल्की भारी मिट्टी इसके लिए काफी उपयुक्त है।

उन्नत प्रभेद

इसके प्रभेदों को दो भागों में बांटा जा सकता है। सामान्य और हाईब्रिड बैंगन की अच्छी पैदावार हेतु मुख्य सामान्य उन्नत प्रभेद हैं पूसा परपल लौंग, राजेन्द्र बैंगन-2, राजेन्द्र अन्नपूर्णा, पंत बैंगन, पंत सम्राट, पंत ऋतुराज, अरकानिधि, सोनाली, कचबचिया इत्यादि।
मुख्य हाईब्रिड प्रभेद है पूसा अनमोल, अर्कानवनीत, पूसा हाईब्रिड-5, पूसा हाईब्रिड-6, एन.डी.बी.एच.-1 इत्यादि।
बैंगन की सामान्य प्रभेद से प्रति हेक्टेयर 200-250 क्विंटल फल का उत्पादन होता है।
हाईब्रिड प्रभेदों कि उत्पादन क्षमता बहुत अधिक होती है परन्तु किसान भाई हाईब्रिड बीज का प्रयोग एक पैदावार लेने के बाद न करें क्योंकि इसके बाद इसकी उपज क्षमता आधी रह जाती है और निरंतर कम होती चली जाती है।

बीज दर एवं बोआई

करीब 375 से 500 ग्राम बीज एक हेक्टेयर के लिए जरूरत पड़ता है। बीज की बोआई के लिए तीन मुख्य समय इस प्रकार हैं:
  1. रबी बैंगन/फसल के लिए: जून महीनें में बीज की बोआई और जुलाई महीने में बिचड़ों का प्रतिरोपण करनी चाहिए।
  2. गर्मा बैंगन के लिए: बीज की बोआई नवम्बर माह में एवं बिचड़ों का प्रतिरोपण जनवरी-फरवरी माह में करनी चाहिए।
  3. बरसाती बैंगन के लिए: बीज की बोआई मार्च महीने में और बिचड़ों का प्रतिरोपण अप्रैल माह में करनी चाहिए।
बीज की बोआई करने के पहले किसान यह सुनिश्चित कर लें कि व प्रभेद किस मौसम में ज्यादा उपयुक्त है।

बिचड़ों का प्रतिरोपण

चार से छ: सप्ताह के बिचड़ों का प्रतिरोपण करना चाहिए। गर्म मौसम के लिए 75 x 60 सेंमी. पर तथा रबी मौसम के लिए 60 x 45 सेंमी. की दूरी पर बिचड़ों का प्रतिरोपण करना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

बैंगन की फसल को 120-150 किलोग्राम नेत्रजन, 80 किलोग्राम स्फुर एवं 80 किलोग्राम पोटाश किआवश्यकता होती है। इसके लिए 200 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद या 30 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट, 5 क्विंटल नीम की खल्ली, 50 किलोग्राम डी.ए.पी. 50 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश, 15 किलोग्राम जिंक सल्फेट तथा 10 किलोग्राम बोरैक्स (सोहागा) खेत की तैयारी के समय ही डाल देना चाहिए। 100 किलोग्राम यूरिया रोपाई के एक माह बाद उपरिवेशन के तौर पर देना चाहिए।
निकाई-गुड़ाई एवं सिंचाई निकाई-गुड़ाई एवं बराबर नमी बना रहे इसके लिए हल्की सिंचाई करते रहना आवश्यक है।

फलों की तुडाई

जब फल पूर्ण रूप से अपना आकार और रंग ग्रहण कर लें तो इसकी तुड़ाई करनी चाहिए।

बैंगन में समेकित रोग एवं कीट प्रबन्धन

बैंगन में कई तरह के रोग एवं कीटों का प्रकोप होता है जिसके कारण इस फसल को काफी नुकसान पहुंचता है। खासकर फल-छेदक और तना छेदक का प्रकोप इतना ज्यादा होता है कि  इससे निपटने के लिए किसान अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं। फलस्वरूप, मित्रकीटों की जनसंख्या तो घटती ही है साथ ही प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाने के चलते लक्षित कोई भी कीट नहीं मरते। वायु प्रदुषण, मृदा-प्रदुषण फैलता है सो अलग। इस तरह से उत्पादित बैंगन भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अत: पौधा संरक्षण के लिए समेकित प्रबन्धन पद्धति को अपनाया जाए तो इन समस्याओं से निजात भी मिल जाएगा और स्वास्थ्य-वर्धक बैंगन का उत्पादन भी होगा।

बैंगन में लगने वाले रोग

  1. डैम्पिंग ऑफ़ (बिचड़ा गलन): इसमें बीज या तो प्रस्फुटित होने के बाद मर जाता है या फिर बिचड़ा बड़ा होने के बाद मर जाता है।
  2. जीवाणु उखड़ा: पौधा में बौनापन आना, पत्तों का पीला हो जाना उसके बाद पूरे पौधे का एकाएक मुरझा जाना एस बीमारी के प्रमुख लक्षण है।
  3. फ्यूजेरियम उखड़ा: पत्तों में पीलापन आना। निचले पत्तों का पीला होना और नसों के बीच में भूरापन आना इस रोग के प्रमुख लक्षण है। ऐसे पौधों के तनों को लम्बवत काटा जाय तो अंदर का गुद्दा भूरा/काला नजर आएगा और अंतत: पौधा में पतझड़ होकर पौधा सुख जाता है।
  4. फोमोप्सिस अंगमारी: पत्तों पर और जमीन से सटे फलों पर स्पाट बनने लगता है। इसके बाद पत्ते पीले होकर झड़ने लगते हैं।
  5. छोटी पत्तों का रोग: इसमें पत्ते छोटे-छोटे हो जाते हैं और फल नहीं लगते हैं। लोग इसे बांझी रोग भी कहते हैं।
  6. मोजैक: यह जीवाणु रोग है। इसमें पत्ती पर मोजैक जैसा चित्र उभर जाता है।

बैंगन में लगने वाले कीट

  1. फल एवं तना छेदक: इसमें कीड़े नए पत्तों एवं फलों में घुसकर खाता है और काफी मात्रा में नुकसान पहुंचाता है।
  2. एपीलैक्ना बीटल: यह लाल, छोटा और गुम्दाकार कीड़ा होता है जो पत्तों को काटकर खाता है।
  3. जैसिड: यह लीफ हापर है जो पत्तों से रस चूसता है फलस्वरूप पत्तों में कुकड़ी हो जाती है।
  4. जड़-निमेटोड: पौधों में बौनापन आ जाता है। पत्ते पीले पड़ जाते हैं। पौधों के जड़ में गाँठ बन जाता है। परिणामस्वरूप पौधे सूख जाते हैं।
  5. लाल-मकड़ी: पत्तों के निचले सतह पर लाल मकड़ी अपना जाल फैला कर पत्तों से रस चूसता है। परिणामस्वरूप पत्ते लाल दिखने लगते हैं।
इन तमाम रोगों एवं कीटों से बचाव हेतु समेकित रोग एवं कीट प्रबन्धन पद्धति अपनाना चाहिए ताकि कम लागत में अच्छी और रसायन-रहित बैंगन का उत्पादन किया जा सके। एस पद्धति में निम्नलिखित विधियों को अपनाना चाहिए।
1. कल्चरल विधि
  •  बैंगन कि खूंटी एवं अन्य फसल अवशेषों को खेत में समय पर बाहर निकाल कर मिट्टी में दबा देना चाहिए।
  • बैंगन फल के तुड़ाई के बाद रोग-ग्रस्त एवं कीट-ग्रस्त फलों को खेत में ना छोड़े। इसे मिट्टियों में दबा दें।
  • गर्मियों में गहरी जुताई करनी चाहिए ताकि मिट्टी में छुपने वाले कीड़े एवं अंडे तेज धुप में नष्ट हो जाए।
  • एक ही खेत में लगातार बैंगन की खेती  नहीं करनी चाहिए।
  • नीम की खल्ली का व्यवहार (6-8 हें.) करने से मिट्टी में पाये जाने वाले कीड़े की जनसंख्या में भारी कमी आती है।
  • सिर्फ अनुशासित एवं प्रमाणित बीजों का ही उपयोग करना चाहिए।
(छ)  बीजोपचार निम्न प्रकार से अवश्य करना चाहिए।
(i)   ट्राईकोडर्मा (फफूंद)- 4 ग्राम/किलोग्राम बीज
(ii)  ग्लायोक्लैडियम (फफूंद)- 4 ग्राम/किग्रा. बीज
साथ ही ट्राईकोडर्मा से मिट्टी उपचार भी करना चाहिए ताकि उखड़ा रोग का नियन्त्रण हो सके। इसके लिए इसका 10 किग्रा./हें. सड़े हुए गोबर में मिला कर पहली जुताई में ही भूमि में मिला देना चाहिए।
(ज)  खेतों में रोगी पौधे, खरपतवार एवं अन्य अवांछित पौधों को नहीं रखना चाहिए। इसलिए समय पर निकाई-गुड़ाई करते रहना चाहिए।
(झ)  4-5 पंछी आश्रय प्रति हेक्टेयर बनाना चाहिए। इसके लिए खेतों में झाड़ीनुमा टहनियों को गाड़ देने से परभक्षी जैसे – बगुला, मैना इस पर बैठेंगे और शत्रुकीड़ों का भक्षण करेंगे।
(ञ)   आक्रांत शाखाओं और फलों को तोड़कर खेत से बहार मिट्टी में दबा दें।
2. मेकैनिकल/यांत्रिक विधि
(क)  आक्रांत फलों एवं पौधों को खेत से बाहर निकाल कर नष्ट कर दें।
(ख)  गंध-पाश का उपयोग: इसके उपयोग से फल छेदक के प्रौढ़ नर आकर्षित होकर फंसते हैं। इस तरह नर कीटों कि संख्या घटती है। मादा कीट का प्रजनन रुकता है और वह नए अंडे देने में अक्षम हो जाती है। नतीजतन फल छेदक कम लगते हैं। इसलिए 5-7 गंध-पाश प्रति हेक्टेयर उपयोग करना चाहिए।
(ग)   पीला-फंदा जो चिपचिपा होता है का 30 फंदा प्रति हें. का उपयोग करने से एफिड और सफेद मक्खी एवं अन्य उड़ने वाले कीड़े (जो पीला रंग पर आकर्षित होते हैं) का नियन्त्रण होता है।
3. जैविक विधि
(क)  फल छेदक, तना छेदक एवं अन्य कीड़ों के नियन्त्रण के लिए
(i)   बैसीलस थुरिनजेनसिस (डीपील -8, डेलफिन) ।
(ii)  एन.पी.भी.-4 मिली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर ।
(iii)  नीम पर आधारित कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए ।
(iv)  बाभेरिया बासियाना, या फफूंद आधारित कीटनाशक है का प्रयोग 4 मिग्रा. प्रति लीटर पानी में घोलकर करना चाहिए।
(v)  लाल मकड़ी से बचाव के लिए सल्फर का प्रयोग करना चाहिए।
4. रासायनिक विधि
कोई भी रासायनिक कीटनाशक का छिड़काव करने से पहले आर्थिक क्षति स्तर का आकलन कर लेना चाहिए और इसका प्रयोग तभी करना चाहिए जब इसकी आवश्यकता आ पड़े।
(i)  आर्थिक क्षति स्तर का आंकलन
(क)  जैसिड – 2.3/पत्ता
(ख)  लाल मकड़ी – 10/स्क्वायूर सेंमी.
(ग)   सफेद मक्खी – 20 निम्फ/पत्ता
(घ)   एफिड – 10 निम्फ/पत्ता
(ङ)    फस छेदक – 5-10 प्रतिशत आक्रांत फल
(ii)      अब रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग तभी करना चाहिए जब कीड़ों का आर्थिक क्षति स्तर ऊपर वर्णित स्तर तक पहुंच जाए।
(क)  विभिन्न प्रकार के मृदा जनित एवं चूसने वाले कीड़ों को नियंत्रित करने के लिए फोरेट 10% जी (दानेदार) 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।
(ख)  चूसने वाले कीड़ों के विरुद्ध थाईमेट 30% ई. सी. मिथाईल डिमेटोन 25% ई.सी. का प्रयोग करें।
(ग)  फल छेदक एवं तना छेदक के लिए
ग्रुप A कीटनाशक      इंडोसल्फान 35% EC या
क्वीनालफाश 25% EC
ग्रुप B कीटनाशक             साईंपर मेथ्रीन – 10% EC
फेनभलरेट – 20% EC
डेकमेथ्रीन – 28% EC
ग्रुप ‘B’ के कीटनाशकों का व्यवहार लगातार नहीं करना चाहिए इससे मित्र कीटों का नुकसान होता है। अत: ऊपर वर्णित सभी तरीकों को अपनाने से रोग एवं कीड़ों का सफल प्रबन्धन किया जा सकता है।

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FAQ

🌿 बैंगन की वैज्ञानिक खेती – सामान्य प्रश्नोत्तर (FAQ)

❓प्रश्न 1: बैंगन का परिचय क्या है?

उत्तर:
बैंगन सालभर पैदा होने वाली पौष्टिक सब्जी है। इसमें औषधीय गुण भी होते हैं। सफेद बैंगन (White Brinjal) विशेष रूप से डायबिटीज़ रोगियों के लिए लाभदायक माना जाता है। यदि किसान वैज्ञानिक विधि से इसकी खेती करें, तो अच्छी पैदावार व लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 2: बैंगन की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु चाहिए?

उत्तर:
बैंगन को लम्बे और गर्म मौसम की आवश्यकता होती है। अत्यधिक ठंड या पाला इस फसल के लिए हानिकारक होता है।

प्रश्न 3: बैंगन की खेती के लिए कौन सी भूमि उपयुक्त होती है?

उत्तर:
उपजाऊ, दोमट या हल्की भारी मिट्टी जिसमें जल निकास अच्छा हो, सबसे उपयुक्त होती है। भूमि का pH मान लगभग 5.5–6.5 होना चाहिए।

प्रश्न 4: बैंगन की उन्नत किस्में कौन-कौन सी हैं?

उत्तर:
सामान्य किस्में:
  • पूसा पर्पल लॉन्ग
  • राजेन्द्र बैंगन-2
  • राजेन्द्र अन्नपूर्णा
  • पंत बैंगन, पंत सम्राट, पंत ऋतुराज
  • अर्का निधि, सोनाली, कचबचिया
हाईब्रिड किस्में:
  • पूसा अनमोल
  • अर्का नवनीत
  • पूसा हाईब्रिड-5, पूसा हाईब्रिड-6
  • एन.डी.बी.एच.-1
उत्पादन क्षमता:
सामान्य किस्मों से 200–250 क्विंटल/हेक्टेयर तक, जबकि हाईब्रिड किस्मों से इससे अधिक उत्पादन संभव है।

प्रश्न 5: बीज दर और बोआई का समय क्या होना चाहिए?

उत्तर:
  • बीज दर: 375–500 ग्राम प्रति हेक्टेयर।
  • रबी फसल: जून में बोआई, जुलाई में प्रतिरोपण।
  • गर्मा फसल: नवम्बर में बोआई, जनवरी–फरवरी में प्रतिरोपण।
  • बरसाती फसल: मार्च में बोआई, अप्रैल में प्रतिरोपण।

प्रश्न 6: बिचड़ों का प्रतिरोपण कब और कैसे करें?

उत्तर:
4–6 सप्ताह पुराने पौधों का प्रतिरोपण करें।
  • गर्म मौसम में दूरी: 75 × 60 सेमी
  • रबी मौसम में दूरी: 60 × 45 सेमी

प्रश्न 7: खाद एवं उर्वरक की मात्रा क्या होनी चाहिए?

उत्तर:
  • गोबर की खाद – 200 क्विंटल/हेक्टेयर
  • वर्मी कम्पोस्ट – 30 क्विंटल
  • नीम की खल्ली – 5 क्विंटल
  • डी.ए.पी. – 50 किग्रा
  • म्यूरेट ऑफ पोटाश – 50 किग्रा
  • जिंक सल्फेट – 15 किग्रा
  • बोरैक्स (सोहागा) – 10 किग्रा
  • यूरिया – 100 किग्रा (रोपाई के एक माह बाद उपरी सिंचाई के रूप में)

प्रश्न 8: सिंचाई और गुड़ाई कैसे करें?

उत्तर:
मिट्टी में हमेशा हल्की नमी बनी रहनी चाहिए। समय-समय पर हल्की सिंचाई करें और खरपतवार नियंत्रण के लिए नियमित निकाई-गुड़ाई करते रहें।

प्रश्न 9: बैंगन की तुड़ाई कब करें?

उत्तर:
जब फल पूर्ण आकार व रंग ग्रहण कर ले, तब तुड़ाई करें। नियमित अंतराल पर तुड़ाई से पौधे पर नए फल लगते रहते हैं।

प्रश्न 10: बैंगन में प्रमुख रोग कौन-कौन से लगते हैं?

उत्तर:
  1. डैम्पिंग ऑफ (बिचड़ा गलन)
  2. जीवाणु उखड़ा (Bacterial Wilt)
  3. फ्यूजेरियम उखड़ा (Fusarium Wilt)
  4. फोमोप्सिस अंगमारी (Phomopsis Blight)
  5. छोटी पत्तों का रोग (Little Leaf Disease)
  6. मोजैक रोग (Mosaic Virus)

प्रश्न 11: बैंगन में प्रमुख कीट कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
  1. फल एवं तना छेदक
  2. एपीलैक्ना बीटल
  3. जैसिड (लीफ हॉप्पर)
  4. जड़ निमेटोड
  5. लाल मकड़ी

प्रश्न 12: बैंगन की फसल में समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन (IPM) कैसे करें?

उत्तर:
समेकित प्रबंधन पद्धति में चार मुख्य उपाय अपनाए जाते हैं –
(1) कल्चरल विधि
  • संक्रमित पौधों और फलों को नष्ट करें।
  • ग्रीष्मकाल में गहरी जुताई करें।
  • नीम की खल्ली (6–8 क्विंटल/हेक्टेयर) का उपयोग करें।
  • प्रमाणित बीज व ट्राइकोडर्मा से बीजोपचार करें।
  • खेत में पक्षी आश्रय (Bird Perch) बनाएं।
(2) यांत्रिक विधि (Mechanical Control)
  • संक्रमित फलों को नष्ट करें।
  • गंध-पाश (Pheromone trap): 5–7 प्रति हेक्टेयर।
  • पीला चिपचिपा फंदा: 30 प्रति हेक्टेयर।
(3) जैविक विधि (Biological Control)
  • बैसिलस थुरिंजिएन्सिस (BT) या एन.पी.वी. का छिड़काव करें।
  • नीम आधारित कीटनाशक (Neem Oil 5%) का प्रयोग करें।
  • बेवेरिया बासियाना (फफूंद आधारित कीटनाशक) का प्रयोग करें।
  • लाल मकड़ी के लिए सल्फर छिड़काव करें।
(4) रासायनिक विधि (Chemical Control)
  • केवल तभी प्रयोग करें जब कीट की संख्या आर्थिक क्षति स्तर (ETL) तक पहुँच जाए।
  • उदाहरण के लिए:
    • जैसिड: 2–3 प्रति पत्ता
    • लाल मकड़ी: 10 प्रति वर्ग सेमी
    • सफेद मक्खी: 20 निम्फ/पत्ता
    • एफिड: 10 निम्फ/पत्ता
    • फल छेदक: 5–10% आक्रांत फल
सुझाए गए कीटनाशक:
  • थाईमेट 30% EC, मिथाइल डिमेटोन 25% EC
  • फोरेट 10% G (10 किग्रा/हेक्टेयर)
  • इंडोसल्फान 35% EC, क्विनालफॉस 25% EC
  • सायपरमेथ्रीन 10% EC, फेनवलेरेट 20% EC, डेल्टामेथ्रीन 28% EC
(नोट: रासायनिक कीटनाशक का उपयोग केवल आवश्यकता अनुसार और सावधानीपूर्वक करें।)

प्रश्न 13: बैंगन की खेती में अधिक लाभ कैसे प्राप्त करें?

उत्तर:
  • हाईब्रिड किस्मों का चयन करें।
  • टपक सिंचाई और मल्चिंग अपनाएँ।
  • फसल चक्र (Crop Rotation) रखें।
  • जैविक खादों का प्रयोग करें।
  • मंडी की बजाय सीधी बिक्री या मूल्य वर्धन (Value Addition) करें।